Demonetization: जनता त्रस्त राजा मस्त !

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Demonetization:

500 और 1000 का नोट बंद करके काला धन खत्म करने का दावा जनता के साथ

क्रूर छलावा से अधिक कुछ नहीं!

8 नवम्बर को प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक टीवी पर यह घोषणा की कि 500 और 1000 के नोट अब प्रयोग में नहीं रहेंगे। इसकी जगह अब 500 और 2000 के नये नोट जारी किये जायेंगे। मोदी का दावा है कि इससे काले धन और नकली नोट पर शिकंजा कसा जा रहा है।

अगर इस फैसले पर थोड़ा भी ध्यान दिया जाए तो ये दावे महज़ छलावे से अध्कि कुछ नहीं है। दूसरी ओर, इससे आम जनता खासतौर पर गरीब, महिला, छोटे विक्रेता, रेहड़ी-पटरी वाले, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए भारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। कई लोगों का रोज़गार ख़तम हो गया है, खाने-पीने का सामान और आवागमन के लिए भी पैसे नहीं हैं। इन सब की भारी कीमत के बावजूद भी काले धन को पकड़ा नहीं जा सकेगा।

क्यों नोटबंदी  की यह नीति काले धन के खिलाफ कुछ नहीं कर सकती-

  1. आज की तारीख़ में यह जानी-मानी बात है कि 90 प्रतिशत काले धन नकदी के रूप में नहीं होता, न ही वो बोरी में भर के बिस्तर के नीचे पड़ा रहता है। इसके बजाय यह सोना, रियल स्टेट में निवेश, स्विस बैंक तथा विदेशी मुद्रा के रूप में रखा जाता है, और इसी तरह के कई गोरखधंधों से काले धन को बढ़ाया जाता है। याद कीजिए मोदी ने चुनाव से पहले खुद बोला था कि 90 प्रतिशत काला धन विदेशों में रखा गया है, जिसको वे वापस लायेंगे और 15 लाख रुपये सभी के अकाउंट में डाले जायेंगे। लेकिन आज तक मोदी सरकार ने काली संपत्ति के उस क्षेत्र को छुआ भी नहीं। उल्टे विदेश में धन भेजने के रास्ते को और भी आसान बना दिया। मोदी सरकार ने एलआरएस (लिबेरालाइज्ड रेमिंटेंस स्कीम) के तहत विदेश में धन भेजने की अधिकतम 75 हज़ार डॉलर की सीमा को बढ़ाकर 250 हज़ार डॉलर कर दी। इस नये ‘सुधार’ का फ़ायदा उठाते हुए इस वर्ष विदेश में 30,000 हज़ार करोड़ रुपये भेजे गये, जो कि पिछले सालों की तिगुना है।
  2. बहुत से राजनेता पहले से ही बात को जानते थे कि 500 और 1000 के नोट बंद हो जायेंगे और 2000 के नोट जारी होंगे। इसी साल 1 अप्रैल में गुजरात के एक समाचार-पत्र में तथा 8 अप्रैल को टाइम्स ऑपफ इंडिया में यह ख़बर छपी कि 500 और 1000 के नोट बंद किए जा सकते हैं। इस प्रकार की ख़बरें और भी कुछ अख़बारों में आयी थीं। स्वयं आरबीआई के आंकड़े कहते हैं कि सितंबर 2016 में बैंकों में जमा होने वाले पैसों में रिकॉर्ड उछाल आया है जिसका वृद्धि दर 5 प्रतिशत है। पिछले तीन महीनों में बैंकों में 5 लाख करोड़ से अधिक पैसे जमा किए गए हैं। भेद खुल जाने के बाद वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कहा कि यह पैसा 7वां वेतन आयोग के बाद लोगों को मिले अतिरिक्त पैसे हैं। जबकि इस वेतन आयोग में अतिरिक्त पैसा महज़ 34 हज़ार करोड़ रुपये ही है। सब जानते हैं कि भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के खाते में 3 करोड़ रुपये मोदी के नोटबंदी की घोषणा के कुछ घंटों पहले जमा कराया गया। मामला बिल्कुल साफ है कि मोदी सरकार ने बड़े कार्पोरेट्स और राजनीतिक रूप से अपने करीबी लोगों और काले धनखोरों को पहले ही आगाह कर दिया था।
  3. कुछ महीनों पहले, जब पनामा पेपर्स ने खुलासा हुआ तो बहुत सारे उद्योगपति, अभिनेता और औद्योगिक घराने अपने काले धन को सफेद बनाने के लिए गैर कानूनी व्यावसायिक गतिविध्यिों में संलिप्त पाए गए। वैसे अनेक रास्ते और चोर दरवाज़े को सरकार ने उनके लिए आज भी खोल के रखा हुआ है।
  4. मंदिरों में दान देने की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित ही नहीं है, इसलिए काला धन इन मंदिरों को दान के रूप में दिया जा सकता है और वे मंदिर पुराने नोटों को बड़ी आसानी से नए नोटों में बदल देंगे और अपना कमीशन लेकर उस दान करने वाले को फिर उसका पैसा वापस कर सकते हैं।
  5. हाल में सरकार ने ‘एंटी करप्शन एक्ट’ में बदलाव लाकर इस प्रावधन को जोड़ दिया है कि सीबीआई अब बगैर सरकारी आदेश के किसी भी सरकारी अधिकारी पर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच नहीं कर सकती। अर्थात् सरकार से राजनीतिक संपर्क बनाए रखने वाले और उसकी चमचागिरी करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों पर अब कार्रवाई नहीं की जा सकती। वे बिना किसी डर के अपने काले धन को बना और बचा सकते हैं।
  6. आज जब 2000 के नोट को प्रचलन में लाया गया है तो इससे क्या काले धन का संग्रह और अधिक आसान नहीं हो जाएगा!
  7. साथियों, यह काला धन बनता कहां से है? इसकी गंगोत्री क्या है? दरअसल मोदी सरकार (और इससे पहले की कांग्रेस सरकार) जिस प्रकार देश के प्राकृतिक संसाधनों को कौड़ी के दाम पर अडानी-अंबानी जैसे कॉर्पोरेट्स को खरबों का मुनाफा कमाने को देती है, नीतियों को बड़े कॉपोरेट्स के हित में बनाया और बदला जाता है, कॉर्पोरेट्स को टैक्स में लाखों करोड़ों की छूट दी जाती है – ये ही हैं काला धन बनने का मुख्य श्रोत। उन्हीं नीतियों पर चलते हुए अगर सरकार काला धन ख़त्म करने की बात करती है तो यह चुनावी जुमला और छलावा से अधिक कुछ नहीं है!

 

असल में निशाना किसे बनाया जा रहा है इस नोटबंदी का-

  1. चुनाव से पूर्व स्वयं नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कई बार यह बात कही कि देश का पैसा काला धन के रूप में विदेश में जमा है। सरकार बनाने के बाद वे इसे देश में लायेंगे और हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये डाले जायेंगे। लेकिन आज उन्हें कौन-सी ऐसी दिव्यदृष्टि मिल गई है कि उन्हें सारा काला धन गरीब जनता, छोटे व्यापारी और महिलाओं-बुजुर्गों की जमा पूंजी में ही दिखने लगा है! दरअसल सरकार ने काले धन को न लाने की इच्छा और इसपर जनता के दबाव और गुस्से को ‘रिलीज’ करने की धूर्त साजि़श रचकर इस नोटबंदी का सहारा लिया है। आज देश की मेहनतकश आबादी अपने सारे काम को छोड़कर बैंकों और एटीएम के सामने लाइन में खड़े होने को मजबूर हैं, जबकि लूट का पैसा सहेजे काले धन वाले इत्मीनान के साथ बैठे हैं।
  2. अर्थव्यवस्था की कुल मुद्रा का 86%, 500 और 1000 के नोटों के रूप में है। देश की वयस्क जनसंख्या की आधी से अधिक आबादी के पास अपना बैंक खाता नहीं है। ऊपर से बहुत तो ऐसे हैं जो अपने खाते का प्रयोग ही नहीं करते। ऐसे में बूढ़े लोग, महिलाएं जिन्होंने बहुत परिश्रम से अपने गाढ़े दिनों के लिए बचत किये थे, वे प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। दूरदराज और गांव के लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें, ख़ासकर किसान इस फैसले की तबाही को झेल रहे हैं। पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है। इस नोटबंदी के चलते अब तक 25 लोगों की मौत हो चुकी है। मोदी साहब जिस नोटबंदी को ‘सर्जिकल स्ट्राईक’ कह रहे हैं क्या इसका निशाना अपने ही देश के गरीब-मेहनतकश लोगों को नहीं बना दिया गया है! मंच पर प्रकट मोदी का दुख घडि़याली प्रवृत्ति का है और जिसे वे जनता द्वारा कष्ट उठाना कह रहे हैं वह लोगों की जान गंवाना हो गया है!
  3. जापान में अपने भाषण के दौरान प्रधनमंत्री मोदी ने नोटबंदी के चलते देश में रूक जा रही शादियों पर व्यंग्य कसा। जबकि कर्नाटक के चर्चित खनन माफिया और भाजपा के पूर्व मंत्री रहे जनार्दन रेड्डी (रेड्डी बंधुओं में से एक) की पुत्री की शादी में कोई कमी नहीं हुई। 50,000 अतिथियों का इंतजाम, 25 हेलीपैड की व्यवस्था और तकरीबन 500 करोड़ का कुल खर्च! किस एटीएम और बैंक की लाइन में लगे थे बेल्लारी बंधु? कहा जा रहा है कि ये पैसा तो उनके चेक के द्वारा निकाला गया था। जी! चेक तो उनलोगों के पास भी है जो दिन भर लाइन में खड़े होकर 4000 की रकम ही निकाल पाते हैं। बहुत साफ है कि इस नोटबंदी से काले धनखोरों को कोई फर्क नहीं पड़ा है।

 

तब यह सबकुछ किसलिए?

  1. 500 और 1000 का नोट बंद करके 2000 का नोट जारी होने से खुल्ला पैसे की कमी के कारण छोटे लेन-देन में बहुत समस्या आ रही है। इस तरह की मात्रा का लेन-देन सिर्फ ‘मॉल’ जैसी बड़ी दुकानों में ही संभव हो पायेगा। यह योजना अर्थव्यवस्था को नकदी विहीन अर्थव्यवस्था की ओर ले जाएगी। इससे बड़े मील मालिकों, बहुराष्ट्रीय व्यापारियों, बड़े खाद्य व्यापारियों तथा रेस्तरां मालिकों को ही फायदा मिलेगा जो नगदी विहीन भुगतान स्वीकार कर सकते हैं।
  2. मोदी ने नोटबंदी के बाद ऑनलाइन पेमेंट के लिए ‘पेटीएम’ (PayTM) जैसी कंपनी को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया। इस कंपनी के सबसे अधिक शेयर चीन के ‘अलीबाबा’ कंपनी के पास है। हाल में मोदी भक्तों द्वारा चीनी सामानों का बहिष्कार कर देशभक्ति निभाने के मंसूबे को भी ‘साहेब’ ने धक्का पहुँचाया है ! ख़ैर! यह प्रकरण इस मायने में दिलचस्प है कि छः महीने पहले आरबीआई ने भी इसी प्रकार का ‘सिंगल विन्डो ऑनलाइन पेमेंट’ के लिए अपना ऐप लॉन्च किया है तब देश के प्रधनमंत्री नोटबंदी की आड़ में किसी निजी कंपनी को किस साहस के साथ प्रचारित कर रहे हैं!
  3. इस नए नियम से अब तक बैंकों में दो लाख करोड़ रु से अधिक की राशि जमा हो चुकी है और जिसकी निकासी के लिए सरकार ने पचास दिनों का समय मांगा है। ये पचास दिन जनता के कष्ट के लिए काफी हो न हो, बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए ये काफी है। इन धन्नासेठों ने सरकारी खजाने से पैसे चूसकर उन्हें लगभग खाली कर दिया था। बैंकों पर NPA (नॉन परफॉर्मिंग एसेट), अर्थात् बैंकों से लिए गए उधर को वापस नहीं करने की स्थिति का दबाव बढ़ते जाने से अब बैंकों की ऐसी स्थिति नहीं रह गई थी कि वह बड़े कार्पोरेट्स को और अधिक कर्ज दे सके। इस नोटबंदी ने देश की जनता को अपने सारे पैसे बैंक में जमा कर देने को मजबूर कर दिया। अब इस नई हरियाली को चरने का मौका सरकार उन्हें मुहैया करवायेगी। संभव है हमारी इस जमा पूंजी को डकार कर एकाध और माल्या उड़न-छू हो जाए।
  4. 16 नवंबर को ही एसबीआई ने 63 बड़े पूंजीपतियों के कर्ज को माफ कर देने की घोषणा कर दी जिससे 7,000 करोड़ रुपये सदा के लिए इन डिफॉल्टर्स की तिजोरी में छोड़ दिए गए। इसमें विजय माल्या का 1200 करोड़ रुपया भी माफ हो गया। ग़रीब जनता के पैसे को बैंक में रखवाकर उन्हें अडानियों-अंबानियों और माल्याओं में वितरण करने का ‘देशभक्त’ पैंतरा है नोटबंदी का यह फरमान!

 

साथियों, भाजपा द्वारा गरीब जनता की गाढ़ी कमाई पर किये गए हमले और अर्थव्यवस्था में पैदा की गयी भारी अराजकता के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना ही हमारे सामने एकमात्र विकल्प है। अपने चुनावी वायदों के हर मोर्चे पर असफल मोदी सरकार के इस नये पाखंड का हर स्तर पर पर्दाफाश किया जाना चाहिए।

 

500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण : आम जनता के लिए आर्थिक आपातकाल

9 नवम्बर वह दिन था जब मोदी सरकार के आदेश पर एनडीटीवी इण्डिया चैनल को एक दिन के लिए बंद किया जाना था ताकि मीडिया को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ और ‘जिम्मेदार पत्रकारिता‘ का पाठ पढ़ाया जा सके। लेकिन इस अघोषित आपातकाल को पूरे देश में विरोध का सामना करना पड़ा,फलस्वरूप सरकार पीछे हटने पर मजबूर हुई और यह प्रतिबंध लागू होने से रुक गया। जनता इसके बाद राहत की सांसें ले पाती, कि नरेन्द्र मोदी ने अचानक एक घोषणा कर दी वह भी ‘आर्थिक आपातकाल‘ से कम नहीं है। 8नवम्बर की मध्य रात्रि से 500 और 1000 के नोट गैरकानूनी घोषित कर दिये गये। एक ही झटके में सरकार ने 14 लाख करोड़ रुपये यानि प्रचलन में मौजूद कुल भारतीय मुद्रा के 86 प्रतिशत को रद्दी कागज में बदल दिया।

मोदी और उनके मंत्री एवं उनके पक्ष में जनमत बनाने वाले तुरंत हरकत में आ गये और इस कदम को काले धन के विरुद्ध एक निर्णायक एवं अभूतपूर्व युद्ध,एक और सर्जिकल स्ट्राइक, की संज्ञा दे डाली। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब भारत में मुद्रा का विमुद्रीकरण हुआ हो। आजादी की पूर्व संध्या पर1946 में 1000 और 10000 के नोट रद्द किये गये थे, जो कि 1954 में1000, 5000 और 10000 के मूल्यों में पुनः जारी किये गये। बड़े मूल्य वाले इन नोटों को मोरारजी देसाई की सरकार द्वारा जनवरी 1978 में एक बार फिर रद्द कर दिया गया था। हाल ही में जनवरी 2014 में किये गये आंशिक विमुद्रीकरण को भी हमने देखा जब वर्ष 2005 से पहले छपे 500 और1000 के सभी नोटों को प्रचलन से वापस लिया गया था। इसलिए अब यह बताने की कोई जरूरत नहीं रह जाती कि विमुद्रीकरण से काले धन पर कभी भी बंदिश नहीं लग पायी है। इस बार का विमुद्रीकरण इसलिए विलक्षण है कि इसकी निहायत ही नाटकीय अन्दाज में स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा उद्घोषणा की गई और बिना किसी पूर्व सूचना के तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया। ठीक वैसे ही जैसे कि 1975 के आपातकाल ने भी आधी रात में अचानक दस्तक दे दी थी।

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इस नाटकीय विमुद्रीकरण को काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताना नितांत ही भ्रामक है। सभी जानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने विदेशी बैंकों से काला धन वापस लाने का बार-बार वायदा किया था। इस वापस लाये जाने वाले खजाने से प्रत्येक भारतीय को 15 लाख रुपये देने का वायदा किया गया था, जिसे बाद में भाजपा अध्यक्ष द्वारा ‘जुमला‘ बता कर खारिज कर दिया गया। अब, मोदी राज के दो साल बीतने के बाद विदेशी बैंकों में जमा धन की चर्चा को घरेलू जमाखोरी की ओर मोड़ दिया गया है,मानो कि काला धन वाले धन्नासेठ अपने पैसे को घरों में छिपा कर रखते हैं और उसे एक ही झटके में बाहर निकाल लिया जायेगा। ऐसे दावे पर भरोसा तो किसी कल्पनालोक में जाकर ही हो सकता है।

असल जीवन में सभी जानते हैं कि काले धन का बहुत छोटा हिस्सा ही कैश में रखा जाता है, वह भी थोड़े समय के लिए और अधिकांश हिस्सा निरंतर गैरकानूनी सम्पत्ति (रीयल एस्टेट, सोना, शेयर या किसी अन्य फायदे वाली सम्पत्ति में निवेश) में बदलता रहता है, अथवा राजनीतिक-आर्थिक तंत्र के संचालन में खप जाता है (राजनीतिक फण्डिंग, रिश्वत आदि जो सत्ता के दलालों और परजीवी वर्गों की विलासिता के खर्चों को पूरा करने में लगता है)। यदि मान भी लिया जाय कि इस विमुद्रीकरण से काले धन की समस्या का समाधान हो जायेगा, तो यह काले धन के उस बहुत ही छोटे अंश का होगा जो इस समय कैश में मौजूद है। सर्जिकल कुशलता तो उसे कहते हैं जो किसी बीमार अंग को काट कर निकाल दे और आसपास के स्‍वस्‍थ अंगों पर कोई असर न पड़े, परन्‍तु इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक‘ ने तो आम जनता – दिहाड़ी मजदूरों, स्ट्रीट वेण्डरों, छोटे व्यापारियों और बैंको एवं डेविट/क्रेडिट कार्डों की पहुंच से बाहर आम लोगों – पर चौतरफा हमला बोल दिया है।

500, 1000 और यहां तक कि अब 2000 रुपये वाले नये नोट जल्द ही वापस आ जायेंगे। अफवाहें चल रही हैं कि नये नोट तकनीकी रूप में ऐसे बनाये जायेंगे कि उनके जाली नोट नहीं बन सकेंगे, यहां तक कि सेटेलाइट के माध्यम से उनके आवागमन पर भी नजर रहेगी, हालांकि आर.बी.आई. ऐसी सम्भावना को खारिज कर चुकी है। खैर, आगे से जाली नोट बनेंगे या नहीं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा, लेकिन इतना तय है कि विशाल मात्रा में नगदी वाले ज्यादातर लोग अपनी मुद्रा को नये नोटों से बदल लेंगे क्योंकि 30दिसम्बर तक 2.5 लाख तक की राशि जमा करने वालों को आयकर की जांच में नहीं लिया जायेगा। चूंकि सरकार विमुद्रीकरण की योजना बनाने और इसकी तैयारियों में पिछले काफी समय से लगी रही होगी, तब क्रोनी पूंजीवाद के इस जमाने में इसका पूर्वानुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि काले धन वाले बड़े धन्नासेठों ने अपनी तैयारियां भी तदनुरूप कर लीं होंगी। यह तो गरीब, निम्नमध्य वर्ग के लोग और छोटी बचत करने वाले एवं छोटे-छोटे व्यापारी हैं जो अचानक गिरफ्त में आ गये, जिनमें से अधिकांश पूरी तरह मुद्राविहीन स्थिति में फंस गये हैं और अपनी दैनन्दिन व आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए 100 रुपये के नोटों को ब्लैक में खरीदने को बाध्य हो रहे हैं। जिन लोगों को तत्काल ही इलाज, शादी अथवा यात्रा आदि के लिए जरूरी भुगतान करने हैं वे बेहद मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।

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मोदी सरकार और भाजपा के प्रचारक जनता पर हुए इस ‘कोलेटरल डैमेज‘और ‘थोड़े समय की असुविधा‘ के प्रति बिल्कुल भी चिन्तित नहीं हैं। इसके विपरीत जो अपनी समस्या सामने रख रहा है उसे तत्काल ही भ्रष्टाचार और काले धन का हिमायती बताया जा रहा है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार गौ-गुण्डागर्दी और शासन के भगवाकरण का विरोध करने वालों पर राजद्रोह का आरोप मढ़ा गया था और सर्जिकल स्ट्राइक एवं झूठे एनकाउण्टरों पर सवाल खड़ा करने वालों को राष्ट्रविरोधी और आतंकवाद का पक्षधर बताया गया था। गहराते कृषि संकट, बेतहाशा बढ़ती कीमतें और घटते जाते रोजगार की मार अब भाजपा के धुर समर्थक भी महसूस कर रहे हैं, इसीलिए अर्थव्यवस्था मोदी सरकार की सबसे कमजोर नस बन गई है। विमुद्रीकरण की इस नाटकबाजी से भाजपा को लग रहा है कि उसे चर्चा करने लायक एक ऐसा बिन्दु मिल जायेगा जिससे जनता के गुस्से को ठण्डा किया जा सके और पार्टी द्वारा किये गये बड़े-बड़े आर्थिक वायदों के प्रति कुछ आशा और भरोसा फिर से बन सके।

राजनीतिक गणित और काले धन पर हमले के ढोंग से परे, इसमें कोई शक नहीं कि इस कवायद के पीछे काफी गहरे आर्थिक मंतव्य हैं। बैंकें नगदी के भारी संकट (लिक्यूडिटी क्राइसिस) से गुजर रही हैं। उन्हें भारी मात्रा में कॉरपोरेट कर्जों को माफ करने पर मजबूर किया गया और उससे भी बड़ी मात्रा में बैंकों के बकाये चुकाये नहीं जा रहे हैं। ऐसे में विशाल मात्रा में आम जनता की बचत के पैसों और इसके साथ ब्लैक से व्हाइट बनाये लिए गये काले धन की अच्छी खासी मात्रा पूंजी के नये श्रोत बन वर्तमान नगदी संकट को हल करने का काम करेंगे। दूसरे शब्दों में हम जो देख रहे हैं वह एक नये रूप में कॉरपोरेटों के लिए संकट निवारक रणनीति है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार यह कैशलैस (नगदीविहीन) अर्थव्यवस्था की ओर एक ठोस कदम है। सम्पन्नता की ओर गतिशील तबका तो ज्यादातर इंटरनेट बैंकिंग और कार्ड आधारित लेन-देन के युग में प्रवेश कर चुका है। गली-मुहल्लों की अर्थव्यवस्था वाला भारत जिसमें सब्जी बेचने वाले, रोजाना या साप्ताहिक पारम्परिक बाजारों में दुकान लगाने वाले, गली के परचून वाले या अन्य छोटे दुकानदार आदि हैं जो अभी प्लास्टिक मनी की कैशलैस दुनिया के बाहर हैं। इस विमुद्रीकरण का मकसद ऐसे सभी लोगों को या तो बाजार से बाहर धकेल देना है, अथवा उन्हें नये रचाये गये बाजार के हवाले कर देना है जिसमें बड़ी मछलियों द्वारा छोटी मछलियों को निगला जाना पहले से ही तय है।

भाजपा प्रतिष्ठान के भ्रामक दावों की असलियत सामने लाने के साथ साथ काले धन और कॉरपोरेट लूट के असल खतरे के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही के लिए दबाव बनाना चाहिए और आम लोगों को आर्थिक अराजकता और मुश्किलों में डालने वाली संवेदनहीन सरकार के खिलाफ जनता की गोलबंदी भी करनी चाहिए। भाजपा कह रही है कि सर्जिकल स्ट्राइकों – जो पहले लाइन ऑफ कंट्रोल पर की गई और उसके बाद हमारी जेबों पर कर दी – को आगामी विधानसभा चुनावों में वोटों में बदल दो। हमें ऐसे मंसूबों को नाकाम करना होगा और जनता को गोलबंद कर आने वाले चुनावों को अघोषित राजनीतिक और आर्थिक आपातकाल थोपने वालों को सबक सिखाने के एक अवसर के रूप में देखना होगा।

– दीपंकर भट्टाचार्य

Dipankar Bhattacharya is the General Secretary of the CPI(ML)Liberation.

JNUSU Gives National Call to Intensify the #JusticeForNajeeb Movement

On the 10th of November, the Jawaharlal Nehru University Students Union (JNUSU) issued the following appeal to all progressive and democratic group across the country with an aim to further intensity the movement demanding Juctise for Najeeb – the JNU Student who went missing after a brawl with hooligans belonging to the Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP).

 

 

JNUSU APPEAL

#JusticeForNajeeb

An Appeal for Solidarity and United Protest Actions

Friends,

On 14th October night, Najeeb Ahmed, a student of M.Sc. Biotechnology, JNU was brutally assaulted and violently threatened by a group of ABVP students. From 15th October morning, Najeeb went missing from the campus. The disappearance of a student from a central university in the national capital after assault and intimidation of right wing lumpen is no doubt an ominous reflection of the dark times we are living in.  For past four weeks, students, teachers, staff members of JNU, and citizens of Delhi have been coming out on the streets demanding institutional accountability to bring back Najeeb.

What is absolutely shocking and shameful, the partisan role of the University administration in the whole affair. JNU administration has not taken action on its own nor filed any complaint with the police regarding the assault on Najeeb. None of the University press releases mention the vicious attack and intimidation on him.

Further, the JNU administration is stooping to the lowest levels by repeatedly churning out show-cause notices and threat letters to student activists involved in the movement for Najeeb.

On the other hand, the Delhi police did not allow Najeeb’s mother to mention the incident of assault on Najeeb in her FIR (which now stands as a simple FIR of kidnapping, against unknown persons).

The JNUSU and other eyewitnesses also filed a police complaint naming the persons who assaulted Najeeb and threatened to kill him. But it is utterly appalling that the assaulters named in the complaint have still not seriously interrogated nor have their call records been investigated so far. On the contrary, Delhi Police marshalled all its forces to manhandle Najeeb’s mother and family members and unleash repression on the student protesters demanding accountability from the Delhi Police.

Further, following massive protests during last week, the Delhi Police is now churning out misleading media feeds to divert attention from its own omissions and commissions.

A student from a minority community goes missing from the university, his assaulters roam scot free and the university administration – police – ruling government remain mute spectators. The pattern is simple, clear and unmistakable. The government of the day has waged a war on campuses and on all marginalized sections and dissenting voices across the country. Yesterday it was Rohith Vemula pushed to suicide, then it was JNU students charged with sedition and jailed, today it is Najeeb, tomorrow it may be any of us. From HCU, BHU, DU to JNU- everywhere it is the same design unfolding: the RSS-ABVP goons under full patronage of university administrations and the BJP government get away with each and every vicious attack across campuses, and Dalits, minorities and dissenting voices are intimidated, harassed and even institutionally murdered.

This is the time to fight back! We must unitedly resist Modi government’s war on the dignity and security of the oppressed people, on student-youth, on universities.

JNUSU and different national Students’ Organisations have come together to organise Country-wide Protests for Justice for Najeeb. We appeal to all democratic organisations and elected Student Unions to join hands in this united call for justice for Najeeb.

We appeal to you to endorse and observe the solidarity protest actions in different campuses on the following dates and participate in the “Chalo JNU” march in JNU on 15th November (Marking One Month of Najeeb’s Disappearance).

Against JNU VC’s Total Abdication of Institutional Responsibility Towards Najeeb! Against Continuing Political Protection to the Assaulters of Najeeb! Against Delhi Police’s Gross Non-Seriousness and Misleading  Media Feeds in the Search for Najeeb!

11 Nov : National Students’ Leaders Meet and Press Conference at JNU

12 Nov: Protest and Effigy Burning of JNU VC and Home Minister in Campuses Across the Country

13-14 Nov: Campaign in Different Campuses

15 Nov: Join National call of ‘Chalo JNU’

Juloos and Protest Meeting at JNU

Please upload photos and videos of your protest actions and also mail to us atmohit.jnusu@gmail,satrupa.jnu@gmail.com

In solidarity,

Mohit, President, JNUSU

Amal, VP, JNUSU    

Satarupa, Gen. Secy, JNUSU  

Tabrez, Jt.Secy, JNUSU

 

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Withdraw FIR Against Prof. Nandini Sunder and Others Filed by Chhattisgarh Govt.

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CPIML Statement

CPI(ML) strongly condemns the FIR filed by the Chhattisgarh government against Delhi University professor Nandini Sundar, JNU professor Archana Prasad, CPI(M) Chhattisgarh state secretary Sanjay Parate, Vineet Tiwari from Delhi’s Joshi Adhikar Sansthan and six others. This FIR, ridiculously charging Prof. Sundar and others of the murder of an adivasi villager in Bastar, is clearly an attempt to intimidate all democratic voices speaking out against the ongoing state repression in Chhattisgarh. Apart from murder, they have been charged with criminal conspiracy and rioting.

The ridiculousness of the charges are patently visible. On 4 November, Shamnath Baghel was killed at his residence in the Tongpal area in Chhattisgarh, allegedly by Maoists. According to the Chhattisgarh police and Inspector General of Police Kalluri, Baghel had been getting threats from the Maoists. Nandini Sundar, Archana Prasad, Vineet Tiwari, Sanjay Parate and an unidentified woman activist from Sukma have been accused of “inciting” adivasis against the government and seeking villagers support for Maoists. It is on the basis of these absurd allegations that Prof. Sundar and others are being charged and harassed.

Earlier this year, those named in the FIR were part of a fact-finding team that documented the repression in Bastar. Prof. Sundar and others have consistently been campaigning against the widespread human rights violations in Chhattisgarh. Time and again, democratic voices have exposed the blatant lies of the police and security forces. They have repeatedly brought to light the continuing impunity with which murders, rapes, fake encounters and widespread intimidation of adivasis is taking place in Bastar. It needs to be remembered that the Chhattisgarh Police was recently indicted by the CBI for not just burning 160 homes in Dantewada in 2011, but also for falsely suggesting that Maoists were responsible for the violence and damage. The current IGP Kalluri was the SSP of Dantewada in 2011 when this incident took place. Prof. Sundar, Swami Agnivesh amongst others had played a crucial role in bringing this horrific episode to light.

Clearly, the FIR now filed against Prof. Sundar and others are a punishment for their daring to expose the reality of Bastar, for daring to speak out against the ongoing brutalities unleashed by the police and security forces and supported by the Raman Singh government in Chhattisgarh. Just two weeks ago, police and special auxiliary forces in Chhattisgarh burnt effigies of critics of human rights violations, including Prof. Sundar, at an official protest two weeks ago. And now this farcical FIR has been filed.

Truth is being turned on its head: those who expose murders by Chhattisgarh police and paramilitary forces are now being booked for murder. We are being asked to believe the opposite of truth. CPI(ML) demands an end to the intimidation and harassment of human rights activists, journalists and scholars exposing the reality of Bastar.