कुसुम देवी की अपील – Justice for Dika !

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एक माँ, जिसकी दसवीं में पढने वाली बेटी डीका के साथ सामूहिक बलात्कार कर हत्या कर दी गयी, की अपील !

मैं कुसुम देवी खुरपी-हसुआ चलाकर मजदूरी करती हूँ, लेकिन अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा कर होशियार बनाने का सपना देखती थी. आंबेडकर विद्यालय, हाजीपुर में दसवीं की छात्र थी मेरी बेटी डीका कुमारी.

6 जनबरी 2017 को मेरी बेटी ने मुझे फ़ोन कर होस्टल बुलाया. 7 जनबरी को मैं अपनी बेटी के लिए सेवई-पूरी लेकर हॉस्टल पहुंची. मिलते ही डीका बोली माँ मुझे यहाँ से ले चलो. बहुत पूछने पर बताया की एक सर जी कहते हैं की मेरे साथ गलत काम करो, हम तुम्हारा नंबर बढ़बा देंगे. मैंने शिक्षक से बात करना चाहा तो डीका ने मुझे मना किया की नहीं तुम्हारे जाने के बाद ये लोग मुझे मरेंगे. मैंने कोचिंग के बहाने बेटी को घर ले जाने की कोशिश की, तो एक सर जी ने डांट फटकार करते हुए कहा की अकेली तुम्हारी बेटी ही यहाँ पढ़ती है ? मुझे धकेल कर गेट बंद कर दिया गया. मैं बहार रोती रही, फिर बेबस होकर वापस घर लौट आई. दुसरे दिन गाँव के विकास मित्र के जरिए मुझे खबर मिला की डीका ख़त्म हो गयी है. पूरा परिवार रोते बिलखते छात्रावास पहुंचा, तो देखा की नाली में बेटी की लाश परी है. उसके सारे कपड़े फार डाले गए थे उसके शरीर का कोई हिस्सा नहीं था, जहाँ जख्म या चोट ना हो. नाक-मुंह धुल से सना हुआ था. चेहरा व हाँथ चाकू से कटा हुआ था. शरीर का हर अंदरूनी हिस्सा चाकू से चीरा हुआ था. उसके शरीर के भीतर उसका ही जांघिया ठूंसा हुआ था, जिसे मैंने बहार खींचा तो जमा हुआ खून बहार फूंट परा. छात्रावास की लड़कियों ने उसके कपड़े बदले. मैं रोती-चिल्लाती रही, लेकिन वहां उपस्थित पुलिस और टीचर जल्दी से जल्दी मेरी बेटी की लाश ले जाने की कोशिश में लगे थे. मैं शुक्रगुजार हूँ वहां पढने वाली अन्य बेटियों की, जिन्होंने मेरी बेटी की लाश को तब तक रोक रखा था, जब तक हमलोग वहां पहुँच नहीं गए. लेकिन मैं पहुँच कर भी कुछ नहीं कर ना सकी. आनन- फानन में पोस्टमार्टम हुआ और तुरंत ही दबाब डालकर दाह-संस्कार करवा दिया गया. आज दस दिन बाद भी मेरी बेटी का चेहरा मेरी नजरों के सामने घूम रहा है और मेरे मन में बस एक ही हुक उठ रही है की क्या दलित-गरीब की बेटी ऐसे ही नृशंस बलात्कार हत्या की शिकार बनाई जाती रहेगी ! चूँकि उसने यौन अत्याचार को चुपचाप बर्दास्त करने के बदले मूंह खोला, विरोध किया इसलिए उसे क्रूर सजा दी गई. मेरी बेटी बहादुर व मजबूत थी एक दो लोगों का मुकाबला तो वह अकेले कर सकती थी. इसलिए भेदियों के झूंड ने उसे अपना शिकार बनाया.उसके शरीर का एक-एक जखम यह साबित कर रहा था की वह बचाव में किस कदर लड़ी थी. लेकिन एस.पी. साहब जज बनकर फैसला सुना रहे हैं की ‘बलात्कार की पुष्टि नहीं होती’. डी.एम्. जिनके घर पर स्कूल की गार्ड तैनात रहती है, उन्होंने भी चुप्पी साध राखी है. जो प्राचार्य खुद लड़कियों को धमकती हैं, उस प्राचार्य समेत कोई शिक्षिका इस आवासीय विद्यालय में नहीं रहती. इस छात्रावास में कोपी किताब, डॉक्टर दबाई तो दूर की बात पीने के पानी का इंतजाम नहीं था. लगता है गरीब के घर पैदा होने वाले बच्चों को कुछ टुकड़े फेंक कर सरकार का काम ख़त्म हो जाता है. जिस छात्रवास में बाप-माई या सगे-सम्बन्धी पुरूषों को घुसने नहीं दिया जाता, लड़कियों को गेट से बहार निकलने नही दिया जाता, उसी छात्रावास के भीतर ही मेरी बेटी मार डाली गई. जिनके हाँथ में बेटी को सौपा था भविष्य बनाने के लिए, उन्हीं लोगों ने उसके साथ यह सलूक किया क्यों की वह उनकी काली करतूतों के लिए खतरा बन गई थी. लेकिन सर्कार चुप है क्यों की बात खुलेगी तो कई बड़े-बड़े लोगों के चेहरे पर से पर्दा हटेगा और सिर्फ अम्बद्कर विद्यालय हाजीपुर ही नहीं, बिहार के ऐसे सभी आवासीय विद्यालयों की सच्चाई सतह पर आ जाएगी. मैं अनपढ़ गरीब माँ और मेरी बहादुर बरती डीका बस एक सम्मानजनक भविष्य का छोटा सा सपना देखते थे. आज वह सपना भी मुझसे छीन लिया गया ! मैं बस न्याय चाहती हूँ. न्याय मांगती हूँ ताकि मेरी तरह कोई और डीका की माँ में ना बदल दी जाए.

#JusticeForDika

कुसुम देवी,

डीका जैसी बेटियों की माँ

ऐपवा-आइसा-इनौस द्वारा प्रसारित ।

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