आरा में दलित छात्रावासों पर हमले की अनदेखी और जूझते छात्र

                                                                                                                                                                                                                                                                       -सरोज कुमार-
ब्रह्मेश्वर मुखिया अपने ही बनाए चक्रव्यूह का शिकार हुआ है। जिन लोगों पर उंगलियां उठ रही हैं और जो गिरफ्तार किए जा रहे हैं वे सब उसी सामंतवादी चक्रव्यूह के हिस्से हैं। वहीं दलितों-पिछड़ों के लिए भी यह कम महत्वपूर्ण समय नहीं है। इन्हें सामंतवादी ताकतों, सत्ता, प्रशासन और विपक्ष को समझते हुए अपनी भूमिका तय करनी चाहिए।


मुखिया
 के मारे जाने वाले दिन (1जून को) ही मुखिया समर्थक सामंती ताकतों ने आरा के कतिरा स्थित दलित छात्रावास पर हमला कर आग लगा दिया था। देश भर में आरा शहर का कतिरा मुहल्ला चर्चा में रहा। मीडिया से लेकर सरकार, विपक्ष सबका ध्यान कतिरा स्थित मुखिया के घर पर ही है।मुखिया को लेकर अखबारों ने बकायदा पुलिस के सामानंतर इंवेस्टीगेशन चालू कर रखा था। यहां तक कि उसके भोज में क्या-क्या पकवान बन रहे थे, इस तरह की खबरें सचित्र प्रकाशित हुईं। दूसरी तरफ दलित छात्रों और छात्रावास पर किसी ने ध्यान तक नहीं दिया।

छात्रावास में तोड़ दी गई आंबेडकर कि मूर्ती

कतिरा में सिर्फ ब्रह्मेश्वर का घर नहीं है

स्टेशन के थोड़ी ही दूर से कतिरा शुरु होता है। पक्के भव्य मकान औऱ पांडेय, शर्मा, श्रीवास्तव जैसे नामों के नेमप्लेट देखते ही अंदाजा हो जाता है कि मुहल्ला किन लोगों का है। एक पुराने पत्रकार बताते हैं कि 70 के दशक में जब देहातों में दलितों-पिछड़ों ने प्रतिरोध किया था तो सामंतवादी ताकतों ने कतिरा में बसना शुरु किया था। इसी कतिरा में है ब्रह्मेश्वर का घर। मीडिया में सिर्फ उसके घर की चर्चा रही, लेकिन सिर्फ उसका घर ही नहीं बल्कि इसी कतिरा में है राजकीय कल्याण दलित छात्रावास भी। ब्रह्मेश्वर मुखिया के घर से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर। हमले के बाद से अभी तक यहां का डर गया नहीं है। इसका साफ असर अब भी दिखाई पड़ रहा है। छात्रावास में जहां करीब 300 छात्र रहते हैं वहींडर के कारण मुठ्ठी-भर छात्र ही अभी मौजूद हैं।इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि यह अगड़ी जातियों का कस्बा है और कतिरा के बीच में सिर्फ यह छात्रावास ही दलितों का है। मुखिया के मारे जाने वाले दिन हमले का शिकार भी इसी कारण हुआ था यह। इसी छात्रावास के छात्र राजू रंजन ने बताया,“वे अभी सो कर उठे ही थे कि सुबह करीब 7.30 बजे सामंतवादियों ने हमला कर दिया। छात्र संभल भी पाते कि उन्हें मारा पीटा जाने लगा और कमरों में आग लगाना शुरु कर दिया। डरकर छात्र जान बचाने इधर-उधर भागने लगे”। करीब 17 कमरे बुरी तरह से जला दिए गए हैं और कईयों में भीषण तोड़-फोड़ किया गया। ताला तोड़कर जरुरत के सामान या तो जला दिए गए या फिर लूट लिए गए। साईकिल से लेकर किताबें, कपड़े और प्रमाणपत्र तक फूंक दिए गए। यह हमला सिर्फ उपद्रव भर नहीं है। यह उस सामंतवादी सोच का नतीजा था जो सदियों से बोया हुआ है। उपद्रवियों ने जानबूझ कर इसे निशाना बनाया था। आखिर क्या कारण था कि छात्रावास के आसपास की दुकानें छोड़ दी गई। और तो और छात्रावास में ही एक पंप-हाउस है जिसे थोड़ा-सा भी नुकसान नहीं पहुंचाया गया, क्योंकि इस पंप-हाउस से बाहर के घरों में भी पानी सप्लाई होता है। तो उपद्रवियों का मकसद सिर्फ छात्रावास को नुकसान पहुंचाना था।
इस सामंतवादी सोच का पता इसी बात से चलता है कि छात्रों के पास मौजूद अंबेडकर की मूर्ति और तस्वीरों को भी हमलावारों ने निशाना बनाया। छात्रावास का छात्र-प्रधान विकास पासवान अपने कमरे में अंबेडकर की मूर्ति रखता है। छात्र इस मूर्ति की पूजा अंबेडकर जयंती को किया करते हैं।हमलावारों ने कमरे का ताला तोड़ उसे जलाने के साथ ही उस मूर्ति को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। वहीं छात्र शिवप्रकाश रंजनबताता है कि उसके कमरे की अंबेडकर की तस्वीरें फाड़ी और जला दी गई।

अपना होस्टल दिखाते छात्र

वहीं दूसरी ओर उपद्रवियों ने छात्रावास के अलावा स्टेशन की ओर भी तकरीबन उन्हीं फुटपाथी दुकानों को निशाना बनाया जो गरीबों-पिछड़ों के थे। इन चीजों से साफ होता है कि यह हमला सिर्फ उपद्रव-भर न होकर पूरी तरह से सोचा-समझा सामंतवादी हमला था।

नीतीश के सुशासन का डंडा किसके लिए है
इस पूरे प्रकरण में प्रशासन सिर्फ मूकदर्शक ही नहीं बल्कि एक तरफा बना रहा। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक इस छात्रावास में दिन भर में तीन बार हमला हुआ और प्रशासन रोक नहीं पाया। छात्र राकेश कुमार ने बताया, “हमले के दौरान पुलिस वाले मौजूद थे लेकिन कोई उन्हें रोक नहीं रहा था। पहला हमला 7.30 बजे हुआ फिर दुबारा भी हमला किया गया।उस समय जो छात्र छात्रावास में छिपे हुए थे, पुलिसवालों ने उन्हें पीछे की दीवार कूद कर भागने कहा। मजबूरन छात्रों को बचने के लिए दीवार कूद कर भागना पड़ा”।हमले के तीन दिन बाद 4 जून छात्र डिस्ट्रीक वेलफेयर अफसर  को जब कुछ छात्र वहां जाते हैं तो वह कुछ नहीं कहता। उसी दिन फिर छात्र अपने सामान देखने पहुंचते हैं।छात्र शब्बीर कुमारने बताया कि पुलिस ने उल्टा उन्हें ही धमका कर भगा दिया। छात्रों को आरोप है कि दो छात्रों को पुलिस मारती भी है और वहां तैनात मजिस्ट्रेट जो कि मुखिया की जाति का ही है उसने उन्हें भगाने के साथ-साथ कहा,“साले, सरकार का फ्री का खाते हो, भागो यहां से”।
प्रशासन ने छात्रावास पर हमले के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। दोषियों को चिन्हित करने का काम नहीं किया गया। 18 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने अपनी तरफ से एफआईआर तक दर्ज नहीं की। छात्रों ने अपनी ओर से ही एफआईआर दर्ज किया है। 18 तारीख को ही छात्रों ने डीएम का घेराव किया। डीएम ने इनसे मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वो मिलने से बचती रही और अन्य बड़े अधिकारी भी नहीं आ रहे थे। छात्रों ने भारी दबाव बनाया और डीएम ऑफिस को कुछ देर के लिए तालाबंदी कर दी। तब जाकर 19 तारीख को डीएम ने मिलने का समय दिया और दोषियों को चिन्हित करने का आश्वासन दिया है। लेकिन यह महज दिखावा मालूम पड़ता है। मुखिया के भोज के एक दिन पहले खाना बनाने वाले कुछ सीलिंडरों में आग लगने के बाद डीएम ने तत्काल 8 लाख रुपए मुआवजा घोषित कर दिया था। वहीं दलित छात्रों के लिए कोई मुआवजा घोषित नहीं किया था। घेराव के बाद ही छात्रों की बर्बाद हुए साइकिलों और सामानों का लिस्ट प्रशासन ने मांगा। आखिर इनके लिए इतनी देरी क्यों। यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है।

प्रदर्शन करते छात्र

छात्रों ने बकायदा उपद्रवियों की पहचान बताई है और जदयू-भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया है। छात्र हमले के वक्त मौजूद थे तो वे सामंती उपद्रवियों को पहचान रहे हैं। लेकिन जिस तरह सत्ता से जुड़े लोगों की भूमिका बताई जा रही है और जैसा प्रशासन का रवैया है नहीं लगता कि दोषियों को पकड़ा जाएगा।

नीतीश कुमार के सुशासन का डंडा सामंतवादियों को देख शांत हो जाता है, यह तो पटना में 2 जून को ब्रह्मेश्वर की शवयात्रा के दौरान दिखा ही था। वहीं दूसरी तरफ 20 जून को करीब सौ दलित छात्र पटना आकर प्रदर्शन कर रहे थे तो भारी पुलिस फोर्स के साथ बल प्रयोग कर उन्हें रोका गया और सभी को गिरफ्तार कर कोतवाली थाने में ले जाया गया। ध्यान रहे ये वही पुलिस है जो मुखिया के शवयात्रा के दौरान सामंतवादियों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया था।

कल्याण मंत्री को नहीं मालूम कि दलित छात्रावासों पर हमला भी हुआ था

छात्रों के दबाव बनाने पर उनकी ओर से छह सदस्यीय टीम बना कल्याण मंत्री जीतन राम मांझी से मिलने  को कहा जाता है। हद तो यह हो जाती है जब कल्याण मंत्री छात्रों से ये कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं,दलित छात्रावास पर हमला हुआ है। आखिर सरकार कहां सोई थी अब तक?इन छात्रवासों की देख-रेख करने वाला कल्याण विभाग कहां था? टीम में शामिल छात्र शिवप्रकाश रंजन कहते हैं, “कल्याण मंत्री ने अब एक जांच टीम बना भेजने का आश्वासन दिया है। लेकिन वे बार-बार यहीं कहते रहे कि उन्हें छात्रावास पर हमले की जानकारी नहीं है”।मतलब साफ है कि संबंधित अधिकारियों ने दलित छात्रों के मामले में उदासीनता बरती। जिस तरह से इसको लेकर सरकार का रवैया रहा, नहीं लगता है दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। ऊपर से तब जब सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं पर छात्र आरोप लगा रहे हैं।
आरा के दलित छात्रों के मामले में नीतीश कुछ नहीं कह रहे। मुखिया के मारे जाने की तुरंत एसआइटी जांच और फिर परिजनों की मांग पर सीबीआई जांच की घोषणा हो जाती है। नीतीश सधी हुई भाषा में ही सही मुखिया के बारे में राय देते रहे। मारनेवालों की जल्द गिरफ्तारी की बात कही। वहीं दलित छात्रों की सुध तक उन्होंने नहीं ली। आखिर उनका सुशासन किनके लिए है?
प्रदर्शन करते छात्र

दलितों के रहनुमा कहाँ गए

सत्ता में कौन लोग बैठे हैं, ये तो मुखिया की मौत के साथ ही तय हो गया था। मुखिया को गांधीवादी कहने वाले लोगों को दलित छात्रों का ध्यान भला कैसे आएगा। साथ ही विपक्षी पार्टियों की भी असलियत जाहिर हुई है। ये वहीं पार्टियां हैं जो खुद को दलितों का हितैषी घोषित करती रहती हैं। मुखिया को बड़ा आदमी बताने वाले बड़े-बड़े विपक्षी नेताओं ने भी दलित छात्रों का हालचाल लेना जरुरी नहीं समझा।
मुखिया की मौत की सीबीआई जांच की मांग करने वाला विपक्ष दलित-छात्रों पर हमले की स्थानीय जांच को लेकर भी कुछ कहता नजर नहीं आया, दोषियों की गिरफ्तारी की तो बात दूर ही है। जदयू-भाजपा का तो समझ आता ही है पर लालू यादव और रामविलास पासवान जो दलितों और पिछड़ों के मसीहा बनने का दावा करते हैं, क्यों नहीं कोई पहल की इन्होंने।
वहीं दूसरी ओर मुखिया के भोज में वामपंथी पार्टी को छोड़ सभी पार्टी के नेता शामिल हुए। जदयू-भाजपा के तो तय थे ही, राजद, कांग्रेस और लोजपा के नेता भी भोज की शोभा बढ़ा रहे थे।
मुखिया के समर्थकों के हमले और प्रशासन, सरकार से लेकर अन्य दलों के रुख ने स्पष्ट किया कि दलित-प्रेम का इनका दावा महज ढोंग रहता है। सरकार और विपक्ष तो सामंतवादियों के साथ है। सामंतवादियों और प्रभावशाली लोगों की सुरक्षा से पुलिस को फुर्सत मिलती ही नहीं।
हमले के दिन सामंतवादियों ने दलित छात्रावास के अलावे कतिरा कस्बे के बाहर भी हमले की कोशिश की थी। लेकिन कतिरा के दायरे के बाहर के इलाकों में पिछड़ों और दलितों की बाहुल्यता होने के कारण वे सफल नहीं हो पाए। पकड़ी मुहल्ला, करमन टोला, महाराजा कॉलेज के आसपास का मुहल्ला, नवादा चौक और फिर दलितों के बस्ती जवाहर टोला और बहिरो टोला, इस ओर उपद्रवी हमला नहीं कर सके। ऐसा नहीं कि वे चाहते नहीं थे। स्टेशन की ओर से वे आगे हमला करने बढ़े भी थे पर पिछड़ों-दलितों के प्रतिरोध के कारण वे वापस हो लिए। यही कारण है कि मौलाबाग का दलित-छात्रावास भी बचा रह गया। उपद्रवी वहां बाइक पर बैठ फायरिंग जरुर करने आए पर छात्रावास में हमला नहीं कर पाए थे। फिर भी सारे जगहों में तनाव तो था ही। नवादा थाने के पास मुहल्ले के कुछ पिछड़े-दलित परिवार उस रात जवाहर टोला और बहिरो चले गए थे। अंबेडकर नगर के कुछ लोग भी दूसरे टोलों में चले गए थे।
कतिरा छात्रावास की दिक्कत यही रही की यह कतिरा के अंदर है। इसलिए इसकी सुरक्षा पर ध्यान देना जरुरी बन पड़ता है। छात्र भी इसीकारण चिंतित हैं। दहशत के कारण छात्र आ नहीं रहे हैं। ये तो गनीमत है कि मुखिया को उन्हीं सामंतवादी ताकतों ने मारा है और ये बात सबको पता चल चुकी है वरना स्थितियां और खराब रहती।
इन तमाम स्थितियों और प्रशासनिक की निष्क्रियता के बावजूद दलित छात्रों ने आरा में अधिकारियों का घेराव करने के साथ ही पटना तक प्रदर्शन किया जो उनकी चेतना को दर्शाता है। वे जानते हैं कि प्रशासन पर दबाव बनाए बगैर उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला। यही वह चेतना है जो उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत और सुरक्षित रख सकती है। सत्ता और सत्ता के खेल को समझते हुए ही दलित अपनी भूमिका तय कर सकते हैं। जबकि उनके हितैषी होने का दावा करने वाली पार्टियां और सत्ता सामंतवादियों के सामने झुकी हुई हैं।

दलित छात्र और छात्रावासों की बदहाली का भी एक अलग किस्सा है

आरा में जहां इंग्लिश स्पोकेन से लेकर इंजीनियरिंग के कोचिंग खुलते जा रहे हैं। साधन-संपन्न छात्र कोचिंग करने पटना- दिल्ली चले जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर गरीब दलित छात्र भी हैं जो तमाम तरह की कठिनाइयों से जूझते हुए, साधन-संपन्न न होने के कारण आरा जैसे छोटे शहर के छात्रावास में रह कर ही पढ़ाई कर रहे हैं। ये वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों जैसे महाराजा कॉलेज, ब्रह्मर्षि कॉलेज, जैन कॉलेज के छात्र हैं जो आरा के देहाती क्षेत्रों के अलावे भोजपुरी क्षेत्र के अन्य जिलों, बक्सर से लेकर रोहतास तक के गांवों से आते हैं। तकरीबन सारे छात्र मजदूर परिवारों से आते हैं। ये छात्र किसी भी तरह कुछ काम करते या ट्यूशन पढ़ाते अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं।दलित छात्रावासों की खराब हालत भी किसी से छिपी नहीं है। आरा में तीन दलित छात्रवास हैं। सबकी हालत ठीक नहीं। कतिरा छात्रावास में करीब 300 छात्रों के लिए सिर्फ तीन चापाकल हैं। बाथरुम है ही नहीं। मौलाबाग के दलित छात्रावास में ट्वायलेट तक की सही सुविधा नहीं है।वहीं चांदी का दलित छात्रावास किराए के जर्जर मकान में चलता है। ट्रेन गुजरते ही दीवारें हिलने लगती हैं। जान जोखिम में डाल कर छात्र इसमें रह रहे हैं। बुनियादी सुविधाएं भी छात्रावासों में सही से मौजूद नहीं।फिर भी जितनी भी सुविधा मिल पा रही है उसी से ये छात्र अपना भविष्य संवारना चाहते हैं। उनमें एक चेतना मौजूद है। लेकिन वहीं दूसरी ओर सामंतवादी ताकतें ये देख नहीं पा रही हैं।

सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की आईआईएमसी से. अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

Courtesy: Patrakar Praxis

Student-Youth Rights Campaign For Education, Employment and Democracy! Against Corruption and Corporate-Loot!

9th Aug 2012 March to  Parliament!

Defend the Fundamental Right

to Education and Employment with Dignity!!

Under the UPA, the country is reeling under corruption, commercialization, back-breaking inflation, vanishing public services, growing unemployment and attacks on democratic rights. Look at the scenarios that are unfolding daily: 

  • Kapil Sibal’s Education Bills in Higher Education: These bills are paving the way for corporate takeover of higher education; for immunity of corporate and foreign educational shops from the existing laws of the land; for massive fee hikes, commercialization, “user” charges, and an official good-bye to social inclusion and social justice, especially SC/ST/OBC/PH reservations.
  • Private Education Shops And Private Sector Jobs: Young people who spend lakhs of rupees at coaching and private engineering, medical, and management institutes, end up working for a pittance in private corporations, lacking job security or dignity, and with the constant threat of losing their jobs.
  • Increased Fees in Delhi’s Schools: Schools are now education “shops” and businesses! The average expenditure for PRIMARY schooling in Delhi is Rs 3.5 LAKHS annually!
  • Nurses on Strike in Faridabad: Poor wages, long working hours, no regulation..
  • Maruti Factory In Gurgaon: 70-80% of workers are ‘temporary’, working under inhuman conditions
  • UPA Says It Cannot Pay Legally Mandated MINIMUM WAGES Under the NREGA …While Rs 250 crore PER HOUR is given as “TAX REBATES” to super-rich corporations!
  • If You Earn Rs 26/per day in Rural Areas and Rs 32/per day in Delhi, Montek Singh Ahluwalia and Manmohan Singh Say “YOU ARE NOT POOR”! The same Montek has, for the last seven years, been spending Rs 2.02 lakhs per DAY of taxpayer’s money on foreign trips…

 India Under the Stranglehold of State-Sponsored Corruption and Corporate Loot

From the Commonwealth Games Scam, the 2G spectrum scam, the KG Basin scam in allocating oil and natural gas exploration to Mukesh Ambani’s RIL, to the Devas-Antrix deal of ISRO  and the recently exposed coal block allocation scam right under PMO, UPA’s regime of corruption and corporate loot has been exposed time and again. Various NDA governments in the states – Karnataka, Bihar, Uttarakhand and Gujarat – have also presided over massive scams and outright loot of natural resources. In both UPA and NDA regimes, the precious natural resources of the country are being handed over for corporate greed and profiteering. The very notion that resources should be carefully used for “public” good is now being officially rewritten; ‘resources’ are now merely ‘sources’ of generating windfall profits for a select few rich and privileged.

Today, people are angry with rising prices, corruption, unemployment and inhuman working conditions. Last year, we saw a massive movement against corruption and corporate loot, and against the economic policies of privatization. But, the government AS WELL AS the opposition played a cruel joke with the real aspirations of the people, and passed a toothless, ineffective Lokpal Bill. The BJP as well as the Congress DID NOT allow corporations, the army, the judiciary, MPs and Cabinet Ministers to come under the ambit of the Lokpal Bill!

 60 Years After Independence, No Basic Right to Employment and Education!

On the one hand, as scams and open loot of our resources are taking place, the government is LEAST interested in ensuring proper education and dignified employment for all. Today, even those who are employed are underpaid, insecure and work in horrible conditions.

Life as a Worker:

We get a lunch break of exactly 30 minutes and a tea break of 5 minutes. The canteen is 400 meters away from the workplace. In those thirty minutes, we have to remove our safety clothes and goggles, run to the canteen, stand in so many different lines to pick up food, gulp down the food, go to the toilet, run back, put the goggles and safety clothes on again, and resume work. ..If we are even one minute late, Rs 1000-1500 is deducted from our salary. Imagine that in the 5 minute tea break, we are supposed to have tea and snacks and restart work. There is no break allowed for visiting the toilet at any time. If a reliever does not come, a worker is forced to work a 16-hours shifts. Those workers who refuse to do over time are abused and insulted.” (Interview with Worker in Maruti’s Car Factory)

Employment in urban areas is available mostly in call centres, shopping malls, multinational and private companies and factories. Such jobs are on a contractual basis, where wages are only a token fulfillment of formality and the employees are denied even the minimum democratic and basic rights. In rural areas, some employment is available in the field of education and health, but here also it is on a contractual basis and there is an appalling lack of basic rights.

At the same time, fertile farming land and natural resources are being sacrificed to corporate loot. Agricultural subsidies are systematically being lowered, resulting in unemployment and displacement in rural areas as well as large-scale migration to cities. Employment opportunities in government jobs are continually being reduced. Lakhs of posts remain vacant, and government “recruitment” boards and commissions have been sacrificed to irregularities and corruption. This is the true picture of today’s unemployment-ridden India. To top it all, the government is now planning to introduce FDI in the retail sector, which will further lead to massive unemployment and loss of livelihoods.

 In India, 50% of the population lacks basic education and 90% of the youth is deprived of higher education. And what do our governments do to address this serious problem?

The farcical “Right to Education” Act was passed, which is nothing but a cruel joke in the name of genuine right to education. This bill allows primary education to pass into the hands of the private sector, and absolves the private sector of any responsibility of ensuring education. Kapil Sibal has several bills for higher education (the Foreign Universities Bill, the Private Universities Bill, the Educational Tribunals Bill etc). All these legislations are also an open invitation for unregulated commercialization, privatization, massive fee hikes and user charges for basic requirements like water and electricity and rewriting of curricula to suit private players. Not just this, these legislations (if passed) will bid an OFFICIAL goodbye to reservations, social justice and inclusion in higher education.

At the same time, weapons like the Lyngdoh Committee recommendations are being used to suppress democratic activities and student unions in campuses.

Today we have a government which gives a tax concession of 5 lakh crore rupees to corporate houses annually in the budget and facilitates the loot of natural resources. This same government does not provide basic education and employment with dignity to the students and youth of this country.  How do the powers-that-be manage to implement these bizarre and anti-people policies, and preside over this regime of corporate loot? Clearly, aided by a long stream of draconian laws and measures. AFSPA, the Chhattisgarh State Public Security Act, the UAPA, Operation Green Hunt, Salwa Judum – are all being used to target people’s movements and genuine democratic aspirations.

 In this situation students and youth must come out on the streets to strengthen the struggle for their rights to education and employment and for an end to corruption.  All India Students’ Association (AISA) and Revolutionary Youth Association (RYA) have drawn up a Charter of Student-Youth Campaign for Employment-Education and Democracy to moblise students and youths for a country-wide struggle.

STUDENT-YOUTH CHARTER OF RIGHTS

RIGHT TO EMPLOYMENT CHARTER

1. Employment with dignity should be given the status of a fundamental right by the Central government. Make an Employment Guarantee Scheme for urban areas.

2. Unemployed youths above the age of 25 should be given respectable unemployment allowances by every State government.

3. All workers under contractual or honorary basis should be immediately regularized as permanent workers. Make Commissions and Boards formed for giving employment regular and transparent. Fill vacant posts immediately.

RIGHT TO EDUCATION CHARTER

1. Scrap the current Right to Education law which denies the principle of right to basic education and encourages the privatization and commercialization of education. Bring a new Right to Education bill based on “common school system”!

2. Immediately repeal the Private Universities Bill, Foreign Universities Bill along with all the bills proposed in Parliament by the MHRD, which clear the way for privatization of education and corporate loot. Repeal the recommendations of the Lyngdoh Commission, which are against the principles of democracy and conduct Students’ Union elections according to democratic procedures on all campuses.

3. Make laws at Centre and State levels to regulate and monitor the exorbitant fees structures, admission processes, evaluation processes and administration of all primary to higher educational private and semi-government institutions. Guarantee the implementation of reservation in educational institutions so that all deprived sections of society are represented, ensure democracy, transparency and removal of all discrimination!

DEMOCRATIC RIGHTS CHARTER AGAINST CORRUPTION AND CORPORATE LOOT

  1. Scrap the government Lokpal draft. Pass an effective Jan Lokpal Bill which brings the army, judiciary, NGOs, PM, MPs and ministers in its ambit. Make the structure of the Lokpal socially inclusive and democratic. Repeal the privatization and new economic policies basically responsible for corruption!
  2. Stop giving tax concessions to corporate houses.  Scrap the policies which facilitate the privatization and corporate loot of land, minerals, water, coal, seeds, spectrum and other natural resources. Declare all natural resources to be national wealth!
  3. Repeal repressive laws such as AFSPA, UAPA and the Sedition Act as well as measures like Operation Green Hunt which have been made to suppress democratic movements and protest.