Stand Against State-Military Atrocities on Students in Kashmir

End Impunity and Investigate Human Right Abuses and Killings by Armed Forces

cartoon Courtesy : Rebel Politik

As death, pain and suffering marks seasons in Kashmir, the summer has arrived with the news of more deaths and atrocities at the hands of military forces. On April 09, 2017, a mere 6.5% voters voted in the Srinagar by-poll. In the repoll at 38 booths on April 13, the vote percentage was even lower – just 2%. This shows that for Kashmir’s people, the movement of resistance that began in July last year has not ended. Armed forces shot dead eight civilians during the election process on April 9. At least one of these was summarily shot dead in clear violation of standard norms for dealing with civilian protests. Since then, a slew of atrocities against civilians have been videotaped and released – apparently by members of the troops themselves.   

On the day of re-polling, Farooq Ahmad Dar, a voter was picked up the 53 RR unit of Indian Army, and tied to the front of their jeep as the convoy passed through several villages. While this was supposedly done to ‘deter stone pelters’, this image reminds us of the brutal human shield policy used by Israeli forces against Palestinians. Taking human shields are not only prohibited under Geneva conventions (it is considered as hostage taking), it’s also the most inhuman form of warfare any ‘civilized’ military force can use. Shamefully, the Attorney General representing the Central Government has declared that this illegal act was a ‘smart thing’ for the officers to have done. Unfortunately, though this the first time such an incident has been photographed, military forces have been using relatives and family members of militants as ‘human shields’ in counter insurgency operations for long. We must also recognise that the claim that Dar was used as a ‘shield’ is a pretext, the reality is that he was subjected to public humiliation to remind the entire Kashmiri people of their subjugation. The incident can be compared to the incidents of stripping and parading etc that occur during atrocities against Dalits and adivasis.  

On 15 April, at least one armoured vehicle entered the campus of the Pulwama Degree College, followed by attempts by police to shift their post to the gates of the College. Students’ protests against this were met with brutal repression, in which more than 50 students were injured. The same evening, Sajjad Hussain Sheikh was killed after being shot in the head by BSF allegedly for protesting and pelting stones.

Outraged over the brutal crackdown on students, and killings by the forces, Kashmir is witnessing a massive student uprising with thousands of students, including women across the region protesting on streets. As usual, these students’ protests were encountered by crackdown by police and paramilitary forces which left hundreds injured.  Iqra Sidiq, B.Com first-year student of women’s college at Nawa Kadal in Srinagar suffered a serious skull fracture when she was hit on the head by a stone thrown by a CRPF trooper into the campus. There is video documentation of paramilitary troops lobbing tear gas shells and rocks over the walls and under the gates of the women’s college campus, indicating that students were attacked not just while protesting on the streets but even inside their own campus! 

With pictures and videos of atrocities against Kashmiris going viral, rather than addressing the issues the state is now trying to ban the internet and social media platforms.

In sections of the Indian media, there are attempts to justify the atrocity videos by highlighting a video of CRPF jawans being subjected to abuse and slaps etc by civilians. We need to underline here that there is a vast difference between unarmed civilians displaying anger against CRPF jawans, and Army, paramilitary and police indulging in organised, systematic, repeated acts of illegal torture and summary execution. Moreover, we need to recognise that if the jawans rather than political leaders are facing people’s anger in Kashmir, it is because the political leadership in New Delhi and Srinagar has abdicated its responsibility of addressing the political issues being raised by the Kashmiri people.  

  

We demand an impartial investigation into each of the incidents of atrocities and violence that have come to light since April 9, and punishment for the perpetrators. We appeal to students and people of the country to go beyond the highly opinionated and frenzied ‘broadcasts’ on mainstream TV screens and stand by the principles of democracy, justice and peace in Kashmir

 

सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट फासीवाद के दौर में अम्बेडकर को याद करना

 

जब हम डॉ. अम्बेडकर की 126 जयन्ती मनाने जा रहे हैं तो उसी समय मोदी की केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने डॉ. अम्बेडकर के ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो’ के नारे पर हमला बोला हुआ है, बल्कि इन सरकारों का लक्ष्य है ‘वंचित करो, उत्पीड़न करो, अलगाव में डालो’!!
हम देख रहे हैं कि यूजीसी नोटिफिकेशन 2016 के बहाने जेएनयू व अन्य विश्वविद्यालयों में एमफिल/पीएचडी में नामांकन की सीटों में भारी कटौती की जा रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में स्ववित्त पोषित ‘स्वायत्त’ कॉलेजों के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है. इसके बाद ये कॉलेज बड़े पैमाने पर फीस वसूली करेंगे और अध्यापकों की सेवा-शर्तों पर हमले करेंगे. पंजाब यूनिवर्सिटी में भारी फीस-वृद्धि के विरोध में आंदोलनरत छात्रों पर बर्बर पुलिसिया दमन किया गया और उनके उपर ‘देशद्रोह’ तक का चार्ज तक लगाया गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फीस को तीन गुणा तक बढ़ा दिया गया तथा स्नातक/स्नातकोत्तर के लिए न्यूनतम योग्यता को भी बढ़ा दिया गया। रोहित वेमुला के हत्यारे आज खुलेआम घूम रहे हैं और उन्हें पुरष्कृत भी किया जा रहा है। जेएनयू का नजीब अब तक ग़ायब है और उसके हमलावरों एबीवीपी को पुलिस, प्रशासन और सत्ता का राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है। सभी संस्थानों के लोकतांत्रिक ढांचों को ख़त्म कर निर्णय लेने वाले महत्त्वपूर्ण पदों पर जबरन संघी विचारधरा के लोगों की नियुक्तियां की जा रही हैं। एससी/एसटी छात्रों के स्कूलों समेत देश के ज्यादातर स्कूल जाति, वर्ग व जेंडर आधारित क्रूरताओं को झेल रहे हैं. उत्तर प्रदेश, असम और अन्य भाजपा शासित राज्यों में शिक्षा के भगवाकरण के प्रयास हो रहे हैं. शिक्षा का ठेकाकरण और अनियमितीकरण किया जा रहा है.
शिक्षित होने के अधिकार पर हमले के साथ ही साथ संगठित होने और संघर्ष करने के अधिकार पर भी हमला किया जा रहा है. संगठन बनाने के संवैधानिक अधिकार को उठाने के ‘अपराध्’ में मजदूरों को जेल में डाला जा रहा है, छात्रों को ऐक्टिविज़म के लिए दंडित किया जा रहा है और हर जगह जनान्दोलनों को कुचला जा रहा है.  
जातिगत भेदभाव को बनाये रखने के लिए आरएसएस का एजेंडा: ‘समर नहीं समरसता’-
सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस अम्बेडकर के क्रांतिकारी दृष्टिकोण को दफ्न करके उनके संदेश को खोखला बनाने में लगे हुए हैं. ‘सामाजिक समरसता’ नाम की अपनी किताब में मोदी खुद ‘समर नहीं समरसता’ का उपदेश देते हैं. उनका दावा है कि अम्बेडकर ने न तो जातिवाद के खिलाफ संघर्ष किया और न ही हिंदू धर्म से दूर जाने की कोशिश की. बल्कि उन्होंने हिंदू समाज को ‘संगठित’ करने की कोशिश की. यह और कुछ नहीं अम्बेडकर के जातिवाद के उन्मूलन के आह्वान का मजाक उड़ाना है.
अपनी किताब, 2016 के आईबीएन7 के इंटरव्यू और स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में नरेन्द्र मोदी जब ‘सामाजिक समरसता’ की बात करते हैं तो उनका क्या मतलब होता है? ‘सामाजिक समरसता’ का इनका आशय समझने के लिए हमें आरएसएस नेता और केन्द्र सरकार के मंत्री गिरिराज सिंह के उस बयान को याद करना चाहिए जिसमें उन्होंने रणवीर सेना के प्रमुख ब्रम्हेश्वर सिंह को ‘‘शांति और सामाजिक समरसता में विश्वास करने वाला ‘गांधीवादी विचारक किसान नेता’ कहा था. ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के डैन मोरिसन को दिये अपने अंतिम इंटरव्यू में ब्रम्हेश्वर सिंह ने स्वयं कहा था कि ‘‘शांति और समरसता की पुनर्स्थापना के लिए हिंसा करना पाप नहीं है.’’
इस तरह भूमिहीन दलितों के जघन्यतम जनसंहारों को भगवा गिरोह समर्थित हत्यारे ‘शांति और सामाजिक समरसता की स्थापना’ का पुण्य कार्य समझते हैं.
गिरिराज सिंह और ब्रम्हेश्वर सिंह की तरह ही मोदी और आरएसएस के लिए- (क) सामाजिक ‘समरसता=सामाजिक भेदभाव की स्वीकृति और (ख) दलित और उत्पीड़ित जातियों को ‘सामाजिक भेदभाव’ को चुनौती देकर ‘सामाजिक समरसता’ को भंग नहीं करना चाहिए. उन्हें सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक उत्थान की मांग नहीं करनी चाहिए.

मोदी अम्बेडकर को ‘आधुनिक मनु’ कहते हैं-
यकीन करें या नहीं, 2007 में नरेन्द्र मोदी ने आरएसएस के गोलवलकर की प्रशंसा में लिखे एक लेख में अम्बेडकर को ‘आधुनिक मनु’ बताया. क्या मनुवाद से जीवन भर संघर्ष करने वाले और मनुस्मृति का दहन करने वाले बाबा साहब का इससे बड़ा अपमान कुछ और हो सकता है? इस तरह आरएसएस और मोदी अम्बेडकर का नाम तो रखना चाहते हैं लेकिन जाति के उन्मूलन, संवैधानिक लोकतंत्र, पूंजीवाद विरोध, ट्रेड यूनियन और लोकतांत्रिक अधिकारों के उनकी दृष्टि को मनुस्मृति के जाति, वर्ग, जेंडर अन्याय के साज़िश से बदल देना चाहते हैं. 
इसलिए आज यह अधिक जरूरी है कि हम अम्बेडकर के वास्तविक संदेश को आगे बढ़ाने के लिए उनके लिखे हुए को पढ़ें और उसके अनुरूप पहलकदमियां लें. तभी हम सांप्रदायिक कॉर्पोरेट फासीवाद के हमले से अपने लोकतंत्र की रक्षा कर सकेंगे.

अम्बेडकर ने कहा ‘हिंदू राज’ देश के लिए सबसे विनाशकारी साज़िश-
मोदी के प्रधानमंत्री और योगी के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि भारत तेजी से हिंदूराष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है. अम्बेडकर ने 70 साल पहले ‘हिंदूराष्ट्र’ के खतरे को भांप लिया था और आगाह किया कि-
‘‘निस्संदेह यह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगा. यह स्वतन्त्रता, समता और भाईचारे के लिए खतरा है. इसलिए यह लोकतन्त्र के साथ चलने में अक्षम है. हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए.’’

अम्बेडकर के सपनों का भारत-
अम्बेडकर के मुताबिक, आजादी के समय हमें कोई बना बनाया ‘राष्ट्र’ नहीं मिल गया, जिसके लिए जश्न मनाया जाये। बजाय इसके अम्बेडकर का मानना था कि कड़ी मेहनत से, असमानता और शोषण के आधर को पहचानकर उसे ध्वस्त करते हुए, राष्ट्र का निर्माण करना होगा। अब जरा संघ और भाजपा से बाबासाहब के इन विचारों की तुलना कीजिये जो मौजूदा भारतीय समाज की किसी भी आलोचना को, खासकर जातीय, लैंगिक और सांप्रदायिक भेदभाव की किसी भी आलोचना पर ‘देशद्रोही’ और ‘विभाजनकारी’ का ठप्पा लगाने को व्याकुल रहते हैं! अम्बेडकर ने कहा-
‘‘हमें यह बात संज्ञान में लेते हुए ही बात शुरू करनी चाहिए कि भारतीय समाज में दो चीजों का सिरे से अभाव है। इनमें से एक है समानता। सामाजिक स्तर पर, भारत में हम एक श्रेणीबद्ध असमानता के सिद्धांतों पर आधारित समाज में रहते हैं… इनमें से कुछ के पास अकूत संपदा है, दूसरी तरफ वे लोग हैं जो भीषण गरीबी में दिन गुजारते हैं। 26 जनवरी, 1950 से हम अंतर्विरोधों के एक युग में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, सामाजिक व आर्थिक जीवन में असमानता। राजनीति में हम ‘हर व्यक्ति एक मत’ और ‘हर मत एक मूल्य’ के सिद्धांत को मानेंगे। अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं के कारण हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को नकारना जारी रखेंगे। अंतर्विरोधों से भरे इस जीवन के साथ हम कब तक जिएंगे?’’ (अम्बेडकर, स्पीच इन द कांस्टीचुएंट असेंबली ऑन एडाप्शन आफ द कान्स्टीच्यूशन, 25 नवंबर, 1949, आगे से स्पीच, ज़ोर लेखक का)
नेहरू सरकार द्वारा हिन्दू कोड बिल को कमजोर किए जाने से खफ़ा अम्बेडकर ने कैबिनेट से इस्तीपफा दिया और कहा कि-
‘‘एक वर्ग से दूसरे वर्ग के बीच, एक लैंगिकता से दूसरी लैंगिकता के बीच असमानता हिन्दू समाज की आत्मा है। इस असमानता को अनछुवा छोड़कर सिर्फ आर्थिक समस्याओं से संबन्धित कानून बनाना हमारे संविधान का मज़ाक बनाना है, गोबर की ढेरी पर महल खड़ा करना है।’’

‘‘जातियाँ राष्ट्र-विरोधी है’’
क्या संघ बाबासाहब के इन निर्भीक शब्दों को ‘देश-द्रोही’ कहेगा-  
‘‘मेरी राय में यह मानते हुए कि हम एक राष्ट्र हैं, हम एक भरम पाल-पोस रहे हैं। हजारों जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? दुनिया की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समझ से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं है, हम जितनी जल्दी इस बात को समझ लेंगे, हमारे लिए उतना ही बढ़िया होगा। क्योंकि सिर्फ तभी हम एक राष्ट्र बनाने की जरूरत महसूस कर सकेंगे और इस लक्ष्य को हासिल करने के रास्तों और माध्यमों पर गंभीरता से सोच पाएंगे। इस लक्ष्य का एहसास होना काफी कठिन होने जा रहा है… 
जातियाँ राष्ट्र-विरोधी हैं। प्रथमतया इसलिए कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव पैदा करती हैं। वे इसलिए भी राष्ट्र-विरोधी हैं, क्योंकि वे एक जाति से दूसरी जाति में इर्ष्या और विद्वेष पैदा करती हैं। पर अगर हमें असल में एक राष्ट्र बनाना है तो इन सारी मुश्किलों से पार पाना होगा।’’ (स्पीच)

वास्तविक लोकतन्त्र के लिए जाति-उन्मूलन अपरिहार्य- 
हिन्दू कोड बिल, जाति आधारित प्रतिनिधित्व और आरक्षण सहित तमाम बेहद जरूरी सुधारों की वकालत करते हुए भी अम्बेडकर की लोकतन्त्र की अवधारणा में जाति-उन्मूलन का सवाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। अपनी ‘जाति-उन्मूलन’ (1936) नामक किताब में अम्बेडकर इस सवाल से विस्तार से और बेहद क्रांतिकारी तरीके से जूझते हैं। यह किताब उस भाषण का संस्करण है, जिसे बाबासाहब को जात-पांत तोड़क मण्डल, लाहौर में देना था, पर यह कार्यक्रम बाद में आयोजकों द्वारा रद्द कर दिया गया था। ‘वर्ण-व्यवस्था तो अच्छी है, जातिवाद खराब’ और ‘जाति तो जरूरी है, अस्पृश्यता खराब है’ वगैरह बारंबार दोहराए जाने वाले तर्कों को नेस्तनाबूत करते हुए अम्बेडकर यहाँ ब्राह्मणवाद के मुखौटे को निर्ममता से चीर देते हैं। 
अपनी इसी किताब में अम्बेडकर ने लिखाः-
‘‘असल में हिन्दू समाज जैसी कोई चीज है ही नहीं। यह सिर्फ जातियों का समूह है। हर जाति अपने अस्तित्व को लेकर चैतन्य है। इनके अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है इनकी उत्तरजीविता। ये जातियाँ एक संघ तक नहीं बनातीं। एक जाति दूसरी जाति से कोई संबंध नहीं महसूस करती। इसका अपवाद सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम दंगे हैं। दूसरे सभी मौकों पर एक जाति अपने को दूसरी से अलग करने और अन्य जातियों में विशिष्ट होने की कोशिश करती है। हरेक जाति न सिर्फ शादी-ब्याह, खान-पान आपस में ही करती है बल्कि पोशाक तक अपनी खास पहनती है।’’ 
‘जाति-उन्मूलन’ किताब में अम्बेडकर अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित करने की कोशिशों की तारीफ करते हैं। क्योंकि ‘‘सिर्फ रक्त के मिश्रण से ही सगोत्र-सपिंड होने की भावना पैदा हो सकती है। जब तक सगोत्र-सपिंड होने की यह भावना स्थायी नहीं होती, तब तक अलगाव की भावना, जाति द्वारा पराया बना दिये जाने की भावना नहीं समाप्त होगी।’’ 
आगे वे यह भी लिखते हैं किः 
‘‘आपस में खान-पान न करने, आपस में विवाह न करने या कभी-कभार अंतरजातीय भोज आयोजित करने और अंतरजातीय विवाहों का उत्सव मनाने के लिए लोगों की आलोचना करने या उनका मज़ाक उड़ाने से वांछित लक्ष्य हासिल हो ही नहीं सकता। शास्त्रों की शुचिता पर विश्वास का नाश इसका वास्तविक तरीका है… 
महात्मा गांधी सहित अस्पृश्यता खत्म करने के लिए किए गए सुधार यह समझ नहीं पाते कि शास्त्रों के जरिये लोगों के दिमाग में बैठा दिये गए विश्वासों के चलते ही लोग ऐसे काम करते हैं। लोग अपना व्यवहार तब तक नहीं बदलेंगे जब तक शास्त्रों की शुचिता पर विश्वास करना नहीं छोड़ देते, जिस आधार पर उनके विश्वास की नींव रखी है। इसलिए सहज ही है कि सुधार के ऐसे प्रयास बेनतीजा रहेंगे। अंतरजातीय भोज और अंतरजातीय विवाह आयोजित करवाना और उसके लिए आंदोलन करने के काम कृत्रिम साधनों द्वारा जबरिया किए गए काम हैं। हर पुरुष और स्त्री को शास्त्रों की दासता से मुक्त बनाइये, शास्त्र आधारित घातक विचारों से उनके दिमाग को मुक्त करिए, तब वह पुरुष या स्त्री खुद ही बिना आपके निर्देशों के अंतरजातीय भोज या अंतरजातीय विवाह करेगा।’’ 
इसीलिए, बाबासाहब ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन आयोजित किया और हिन्दू धर्म को नकारते हुए बौद्ध हुए। 

अम्बेडकर ने ‘राष्ट्रवाद’ के नारे का जानबूझ कर दुरुपयोग किए जाने के खतरे से आगाह किया था-
‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?’ में अम्बेडकर ने लिखा-  
‘‘भारत के शासक वर्ग ने अपने आप को कांग्रेस आंदोलन के अगुवा दस्ते में स्थापित कर लिया है और यह सभी को कांग्रेस के भीतर लाने की जद्दोजहद कर रहा है। … यह वर्ग, इस बात को समझ रहा है कि वर्गीय विचारधारा, वर्गीय हितों, वर्गीय सवालों और वर्गीय टकरावों पर आधारित राजनीतिक अभियान इसका खात्मा कर देगा। यह जानता है कि निम्न वर्गों को रास्ते से भटकाने और उन्हें मूर्ख बनाने का सबसे बढ़िया तरीका है राष्ट्रवाद की भावना और राष्ट्रीय एकता का खेल। और यह वर्ग, महसूस करता है कि शासक वर्ग के हितों की सबसे बेहतर तरीके से रक्षा का बेहतरीन मंच कांग्रेस है।’’
उपरोक्त उद्धरण में कांग्रेस की जगह भाजपा-संघ परिवार को रख दीजिये। क्या आपको आज की तस्वीर नहीं दिखने लगेगी? इस तस्वीर में एक पहलू और जुड़ा है- आज राष्ट्रवाद के नाम पर, भाजपा/संघ परिवार राष्ट्रवाद को अल्पसंख्यकों और असहमति की आवाजों के खिलाफ हमलावर हिन्दू बहुसंख्यक के रूप में परिभाषित कर रहे हैं।

अम्बेडकर की समाजार्थिक क्रांतिकारी दृष्टिः पूँजीपतियों और जमींदारों के लिए नहीं, मजदूरों और किसानों के लिए ‘आजादी’ –
न केवल सत्ता वर्ग बल्कि, कुछ प्रभावशाली अम्बेडकरवादी भी पूंजीवाद और भूमंडलीकरण से सत्ता-बराबरी की उम्मीद में अम्बेडकर को ‘मुक्त बाज़ारवादी नवउदार’ के रूप में चित्रित करते हैं। लेकिन अम्बेडकर का जीवन और उनका लेखन संपूर्णता में पूंजीवाद का तीखा विरोध और श्रमिक वर्ग के हित की सहभागिता की उदघोषणा है। 1938 में मनमाड़ में जीआईपी रेलवे दलित मज़दूर सम्मेलन में अपने भाषण में उन्होंने साफ-साफ घोषणा की कि ‘’दलितों का दो दुश्मन है- ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद’’! (14 पफरवरी, 1938 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्टिंग)
अम्बेडकर कांस्टीचुएंट असेंबली में अपने चुने जाने को लेकर अनिश्चित थे, उस वक्त, मार्च 1947 में उन्होंने एक ज्ञापन तैयार किया, जो मई 1947 में ‘राज्य और अल्पसंख्यकः उनके अधिकार क्या हैं और भारत के संविधन में उनकी रक्षा कैसे करनी है’ के नाम से छपा। ‘कांस्टीच्यूशन ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’ नाम से तैयार किया गया यह दस्तावेज़ अपनी क्रांतिकारी लोकतान्त्रिक सामाजिक दृष्टि के लिहाज से बाद में बनने वाले हमारे संविधान से काफी आगे था। दस्तावेज कहता है-  
‘‘मुख्य उद्योग सरकार के हों और उसके द्वारा चलाये जाएँ… अपनी कमाई के समानुपात में हर वयस्क नागरिक को एक जीवन बीमा कराने के लिए राज्य विधिसम्मत रूप से बाध्य करे… कृषि उद्योग राज्य का हो।’’ यही दस्तावेज यह भी कहता है कि राज्य सारी कृषि योग्य भूमि को अधिग्रहीत करे, मानक जोतों में विभाजित करे और गाँववासियों को काश्तकार के रूप में सामुदायिक कृषि के लिए दे।’’ 
यह दस्तावेज भविष्यवाणी सी करते हुए कहता है कि यदि निजी उद्यमों को औद्योगिकीकरण से जोड़ा गया तो इससे ‘‘संपत्ति की वही असमानता पैदा होगी जो निजी पूंजीवाद ने यूरोप में पैदा की है और यह भारतीयों के लिए खतरे की घंटी है।’’ 
कैसे पूंजीवाद, लोकतन्त्र का विरोधी है, इस बात को चिन्हित करते हुए अम्बेडकर ने लिखाः 
‘‘निजी लाभ की खोज और निजी उद्यम पर आधारित सामाजिक अर्थव्यवस्था के काम-काज का अध्ययन करने वाला हर आदमी समझ सकता है कि कैसे यह व्यवस्था लोकतन्त्र के दो सिद्धांतों का वास्तव में उल्लंघन न करते हुए भी उन्हें खोखला बना देती है। वे दो सिद्धांत हैं- लाभ हासिल करने की पूर्वशर्त के रूप में कोई व्यक्ति अपना कोई भी संवैधानिक अधिकार त्याग नहीं सकता और राज्य दूसरों पर शासन के लिए किसी निजी व्यक्ति को अपनी शक्ति का नुमाइंदा नहीं बना सकता।’’ (डॉ. भीमराव अम्बेडकर, स्टेट्स एंड माइनार्टीज़, एपेंडिक्स 1)

उन्होने इस तर्क को शानदार ढंग से काटा कि राज्य का नियंत्रण ‘आजादी’ पर अंकुश लगाएगाः 
‘‘यह आजादी किससे और किसके लिए? साफ ही है कि यह आजादी जमींदारों के लिए लगान बढ़ाने, पूँजीपतियों के लिए काम के घंटे बढ़ाने और पगार घटाने की आजादी है। …अर्थात जिसे राज्य के नियंत्रण से आजादी कहा जाता है, वह निजी मालिकों की तानाशाही का ही दूसरा नाम है।’’ (डॉ. भीमराव अम्बेडकर, स्टेट्स एंड माइनार्टीज़, एपेंडिक्स 1)

संवैधानिक नैतिकता और तर्कवाद के बारे में अम्बेडकर के विचार –
अम्बेडकर ने सामाजिक और संवैधानिक नैतिकता के बीच बेहद महत्त्वपूर्ण विभेद किया था। सामाजिक नैतिकता पुरानी, स्वतःस्फूर्त और सहज बोध पर आधारित वर्चस्वशाली तबकों की नैतिकता है, जो महिलाओं की सामाजिक और लैंगिक आजादी, एलजीबीटी अधिकारों, अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाहों और गोमांस खाने आदि पर पिछड़ा हुआ नजरिया अपनाती है। दूसरी तरफ संवैधानिक नैतिकता आधुनिक, सोच-समझ कर विकसित की गई, समतावाद, सामाजिक न्याय और सेक्युलरवाद जैसे संविधान सम्मत सिद्धांतों पर आधारित है। जैसा कि अम्बेडकर ने चिन्हित किया था ‘‘संवैधानिक नैतिकता सामान्य भावना नहीं है। इसे रचना पड़ता है।’’ (4 नवंबर 1948, कान्सिटिअुएन्ट असेम्बली डिबेट्स, वाल्यू. 7)

श्रम कानूनों और राज्य दमन के बारे में अम्बेडकर के विचार-
इंडस्ट्रियल डिसप्यूट बिल विधेयक मजदूरों के स्वतंत्र संघ बनाने और हड़ताल के अधिकार को काटने-छांटने वाला था। इस विधेयक के खिलाफ संघर्ष के लिए तथा टेक्सटाइल मिल मजदूरों को संगठित करने के लिए अम्बेडकर और कम्युनिस्ट मजदूर संघों ने एकता कायम की थी। मजदूरों के मूलभूत लोकतान्त्रिक अधिकारों के पक्ष में अम्बेडकर के जबर्दस्त तर्कों को आज की सरकारों द्वारा श्रम कानूनों पर दिये जाने वाले दलीलों की धज्जियां उड़ा देने वाले तर्कों की तरह पढ़ा जाना चाहिए। 
“…मेरा उत्तर है कि भारतीय विधान-मण्डल सेवा के अनुबंध के उल्लंघन को इसलिए अपराध नहीं मानता क्योंकि वह सोचता है कि इसको अपराध मानने का अर्थ है- किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य करना और उसको दास बनाना। इसलिए मेरा दावा है कि हड़ताल पर जुर्माना लगाना एक मजदूर को दास बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 
…अगर सदस्य ‘हड़ताल’ शब्द के मेरे अर्थ को मानने को तैयार हैं, जो कि सेवा के अनुबंध के उल्लंघन के सिवाय और कुछ नहीं है, तब मैं निवेदन करूंगा कि हड़ताल, स्वतन्त्रता के अधिकार का दूसरा नाम है।
…निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि यह विधेयक कर्मचारी और नियोक्ता के साथ व्यवहार में समानता लाता है, क्योंकि जिस तरह यह विधेयक कर्मचारियों की हड़ताल पर दंड की व्यवस्था करता है, उसी तरह मालिकों द्वारा की गई तालाबंदी पर भी… समानता अनिवार्यतः निष्पक्ष नहीं होती। समाज में निष्पक्षता लाने के लिए, न्याय के लिए, अलग-अलग तरह के लोगों के साथ अलग-अलग तरह से व्यवहार करना होगा। अगर हम ताकतवर और कमजोर, धनी और गरीब, अज्ञानी और बुद्धिमान के साथ एक जैसा ही व्यवहार करेंगे तो निष्पक्षता पैदा नहीं की जा सकती।“ 
 (बॉम्बे लेजिसलेटिव असेंबली डिबेट्स, भाग 4, पृष्ठ- 1330-59, 15 सितंबर, 1938)

मानव अधिकार और नागरिक सुरक्षा पर-
बॉम्बे असेम्बली में पुलिस गोलीकांड को जायज ठहराने वाली एक जांच रिपोर्ट के खिलाफ अम्बेडकर ने पुरजोर बहस की थी। ठीक वैसे ही जैसे आज फर्जी मुठभेड़, पुलिस फायरिंग या सैन्य दमन के विरोध में बोलना ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में ला दिया गया है। इस रिपोर्ट ने भी आरोप लगाया था कि संघर्ष समिति- खुद अम्बेडकर जिसके सदस्य थे, ने मजदूरों को भड़काया था। 
‘‘…इसलिए मैं माननीय गृहमंत्री से दूसरा सवाल पूछ रहा हूँ। क्या वे गोली चलाने में शरीक पुलिस अफसरों पर साधारण अदालत में मुकदमा चलाने को तैयार हैं, और क्या वे इस समिति की जांच रिपोर्ट का किसी न्यायाधीश या ज्यूरी द्वारा अनुमोदन कराने के लिए राजी हैं? महोदय! मैं इस सदन को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जहां तक कानून का मामला है, उसके सामने किसी पुलिस या सेना के अफसर और एक सामान्य नागरिक में कोई फर्क नहीं है। सदन के लाभ के लिए मैं एक बेहतरीन दस्तावेज़ से एक छोटा सा अंश पढ़ना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि मेरे दोस्त माननीय गृहमंत्री दंगों पर फीदरस्टोन कमेटी की इस रिपोर्ट से वाकिफ होंगे। इस रिपोर्ट के एक अंश में कहा गया है कि:
‘‘अधिकारियों और सैनिकों को कोई विशेषाधिकार हासिल नहीं है और न ही कानूनन उनका दायित्व कोई विशिष्ट है। नागरिक व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य के लिए खास ढंग से हथियारबंद एक नागरिक ही सैनिक है। सैनिक होने के नाते भर से उसे बेवजह किसी इंसान की जान लेने की छूट नहीं मिल जाती।’’ 
…एकमात्र सवाल यह है कि क्या शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमें आजादी और स्वतन्त्रता का सम्मान करना छोड़ देना चाहिए? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, अगर स्वशासन का इसके अलावा कोई मतलब नहीं है, तब इसका मतलब यही हुआ कि हमारे अपने मंत्री हमारे अपने लोगों को गोली मार सकते हैं। बाकी लोग इस पूरी घटना पर हंस भर दें या उस मंत्री का सिर्फ इसलिए समर्थन करें कि वह किसी खास पार्टी से है। ऐसी हालात में स्वशासन भारत के लिए एक अभिशाप ही है, कोई वरदान नहीं।’’ 
(बॉम्बे लेजिस्लेटिव असेंबली डिबेट्स, भाग 5, पृष्ठ- 1724-27, 17 मार्च, 1939)

 

अम्बेडकर के सपनों का भारत कोई बना बनाया ऐसा राष्ट्र नहीं है जहां नागरिकों के लिए सवाल उठाना गुनाह होगा, जहां नतमस्तक जनता से सिर्फ सलामी ली जायेगी। उनकी कल्पना का भारत एक लगातार बनने वाली प्रक्रिया है जहां उसकी सचेत और जागरूक जनता हर गैरबराबरी और शोषण के ख़िलाफ लगातार सवाल और संघर्ष से सम्मान, बराबरी और एकता की राह तलाश रहा हो। इसलिए उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि का आज मतलब है कि ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो’ के रास्ते पर चलकर जाति उन्मूलन के लिए, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए, हिन्दू राष्ट्र के ख़िलाफ़ और अम्बेडकर लिखित संविधन पर संघी हमलों के विरोध् में एक सतत संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए। देश के श्रमिकों, महिलाओं और गरीबों को जकड़ के रखने वाले शोषण के बंधनों को तोड़कर तथा अपने लोकतंत्र को गहराई और विस्तार देने के लिए एकजूट हो जाना ही आज सही मायने में अम्बेडकर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी!

Condemn Police Brutality on Jishnu’s Family by Pinarayi Vijayan’s Government!

 

Brutality in Place of Justice for Jishnu’s Family in Kerala!

Ensure Justice for Jishnu! End the Spate of Crackdown on Protesters and Dissenters in Kerala!

#StandWithMahija

 

AISA Condemns the police brutality upon Jishnu Pranoy’s family. Jishnu (aged 18) a first year Engineering student of Nehru Engineering College, Pambady, Thrissur, died in mysterious circumstances. While his death is alleged to be a suicide, Jishnu’s family has claimed that he was beaten up in the Vice Principal’s room and blood stains have been found in that room. The postmortem report also indicates marks of physical torture on Jishnu’s body.

The Nehru Engineering College is a self-financing college, and self-financing colleges are notorious in Kerala for physical, mental and sexual harassment of students. Jishnu’s friends and family have strongly contested the college’s claim that he was caught copying in an exam – they say Jishnu was beaten and tortured because he questioned why the exam was being conducted by a private agency rather than by the college.

 

When all the accused in the case are wandering free even after three months of the incident, Jishnu’s mother and family seeking justice was dealt with brutally by the Kerala Police. One of the main accused in the case, the chairman of  Nehru College continues to get bail while Jishnu’s family members seeking justice face a crackdown. No action has been taken by the government against the police officers  who manhandled the peacefully protesting Jishnu’s family including Jishnu’s mother Mahija. Instead of taking action against the police officers, the government including the Chief Minister Pinarayi Vijayan has shamelessly come in defence of Kerala Police.

Jishnu himself was a Left supporter. It is indeed shameful that when a government that runs in the name of Left Democratic Front is not only denying justice to Jishnu in his death, but treating his justice-seeking family with utter insensitivity and authoritarian way to shield the accused. Rampant use of laws like the UAPA on independent thinkers and activists as well as encounter killings in Mallapuram indicate the CPIM-led Pinarayi Vijayan government’s contempt for dissent and democratic norms.

AISA extends full solidarity to Jishnu Pranoy’s mother Mahija and his family in seeking justice for him. We are also committed continuing the fight against privatization of education, the undemocratic private teaching-shops run in Kerala and all over India the name of ‘self-financing’, and against all attacks on freedom of expression.

We believe that to be ‘Left’ must mean to stand for people’s rights and liberties. Today, BJP Governments are known for their crackdown on protesters and dissenters. The images of Rohith’s mother and Najeeb’s mother being dragged by the Delhi Police shocked the country. For the LDF Government of Kerala to behave in the same manner towards a mother seeking justice for her son is extremely unfortunate and condemnable in such circumstances. We also wish to remind the LDF government that the people of Kerala elected the LDF government with the hopes of fighting communalism and corruption: the spate of police crackdowns on protesters and dissenters only defeats such hope.

 

See Also:

 Dadri… Shimla….Latehar…Una…Jaipur…and now Alwar: Lynching, Slaughtering Humans In The Name Of ‘Protecting Cows’

Expose Tarun Vijay’s Racist, Condescending Mindset Towards South India

Expose Tarun Vijay’s Racist, Condescending Mindset Towards South India

RSS-BJP’s Tarun Vijay Says: ‘We live with blacks (south Indians), can’t be racist’

Cartoon Courtesy: Indian Express

Tarun Vijay, desperate to deny the obvious racist violence against African people in India, ended up confirming his own racist attitude.
His remark:
Profiles South India as a racial ‘Other’
Indicates that India belongs to ‘We’ (Tarun Vijay &Co.) who condescend to ‘live with’ South Indians!
Tarun Vijay’s remark reflects RSS thinking. Remember Dinanath Batra’s textbooks with a preface by Narendra Modi, which are compulsory in Gujarat schools? Those textbooks:
Use the racist N-word to describe a Black American, saying “very strongly built negro” was like a “tied buffalo.”
Describes Indians as the ‘’perfectly cooked wheat-coloured roti’’, while the Negroes are ‘’rotis that are burnt from staying too long on the fire’’!!!
Tarun Vijay’s remark implies that he thinks of himself and other people in the North India as the perfectly cooked rotis of the correct colour, to whom India belongs, who can tolerate the ‘Others’ who are ‘Black’ or have ‘chapti naak’ (flat noses, as Sushma Swaraj described people of the North East.)
Mr Tarun Vijay, stop denying the ugly reality of racism around us – which is displayed daily in the obsession with “fair skin,” in the indignities and violence meted out to people from the North East states as well as to Black guests from African, Caribbean and other nations.

Dadri… Shimla….Latehar…Una…Jaipur…and now Alwar: Lynching, Slaughtering Humans In The Name Of ‘Protecting Cows’


Make no mistake – the cow is the excuse, it is Muslims and Dalits that are the target.
The Hindu driver at Alwar was allowed to escape, while the 5 Muslims were thrashed. So this was no spontaneous outrage sparked by concern for cows – it was a cold-blooded murderous communal attack.
The Alwar victim was a dairy farmer, had had receipts of cow purchase and licenses for cattle transportation – this proves ‘cow protection’ was a mere pretext.
What the country is witnessing daily is nothing but the Long-Held RSS’ Theory of Hate and Domination in Real Time Action:
“… the foreign races in Hindusthan must either adopt the Hindu culture and language, must learn to respect and hold in reverence Hindu religion, must entertain no idea but those of the glorification of the Hindu race and culture, i.e., of the Hindu nation and must lose their separate existence to merge in the Hindu race, or may stay in the country, wholly subordinated to the Hindu Nation, claiming nothing, deserving no privileges, far less any preferential treatment not even citizen’s rights.”   –
“…Germany has also shown how well-nigh impossible it is for Races and cultures, having differences going to the root, to be assimilated into one united whole, a good lesson for us in Hindusthan to learn and profit by”- Thus wrote Guruji, RSS chief M. S. Golwalkar in  “We or Our Nationhood Defined” (1939)
“There is no reason to suppose that Hitler must be a human monster because he passes off as a Nazi…The very fact that Germany and Italy has so wonderfully recovered and grown so powerful as never before at the touch of Nazi or Fascist magical wand is enough to prove that those political ‘isms’ were the most congenial tonics their health demanded.” -Savarkar in his Presidential address to the 22nd Session of the Hindu Mahasabha at Madura in 1940.
Cry…the Beloved Country!!